Home » Gotiya vol-2, issue-4, March to May 2010 | EDITORIAL

??? 2, ??? 3, ?????? 2009-????? 2010

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आइझ कर जमाना में...!
- बीरेन्द्र कुमार महतो

आइझ कर जमाना में जब कि मोबाइल, टीभी आउर फिलिम गोटा समाज कर आदइत के बदइल देहे, कहना मोसकिल हय कोन सचा हय आउर कोन झूठा। असली-नकली कर फरक मेइट जाय हय। यूज एण्ड थ्रो कर डिजिटल जुग में केकर संग रिसता कतई टेम टिकी, नइ कहल जाय सकेला। दोसती, इयारी आउर पेयार कर मामला में तो आउरो इस्थिति खराब हय। बिंदास पीढ़ी कर ई जमाना में दोसती आउर पेयार जइसन मानवीय संबंधो कर परिभासा बदइल जाय हय। फिकिर कर बात ई हय कि इसन बेमारी से झारखंडी समाज बाँचल रहे, मुदा आब ओहो तेजी से इकर चपेट में आवेक लाइग हे। एहे कारन हय कि झारखंडी छोंड़ा आउर छोंड़ीमन डहर से भटके लाइग हयँ। ई भटकाव छोंड़ामन में दोसर तइर हय तो छोंड़ीमन में दोसर तइर।
बदलाव जिनगी के चलेक ले जरूरी हय। सेले झारखंडियों समाज में ई बदलाव होवी। झारखंड कर आदिवासी समाजों इकर से अछूता नइ रही। लगिन ई बदलाव आपन-आपन समाज कर जरूरत आउर समाजिक-सांस्कृतिक तउर-तइरका से होइ इया कि दोसर समाज कर नकल इया सांस्कृतिक हमला से होइ। एहे मुध सवाल हय। सेले खाली ई कहले काम नइ चली कि बदलाव होबे करी। काले कि आइझ-काइल कर छोंड़ा-छोंड़ी में जोन रकम कर प्रवृति के देखल जात हय, ऊ बेस नखे। खास कइर के झारखंडी समाज ले। आइझ झारखंड कर राजधानी राँची में गाँव से आयके बड़ संख्या में छोंड़ा-छोंड़ा पढ़त लिखत हयँ, नोकरी करत हयँ इया फिन कोनो दोसर-दोसर काम-धंधा, प्रसिछन में लागल-बाझल हयँ। अजादी कर बाद से सहर में रहेक वाला झारखंडी-आदीवासीमनक अबादियो बगरा हय।
ई बेरा में दोसती-इयारी जइसन रिसता बनायक मेंहों सवधान रहेक हय। अनुभव बतात हय कि झारखंडी छोंड़ीमन कर छोंड़ा संग बनाल जादातर रिसता नइ टिकेला। पेयार कर नाँव में बनाल जायक वाला ई रिसत जलदिये टूइट जायला।

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